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Wiki Of Honeybee Farming
आश्चर्यजनक रूपसे सतत परिश्रम करने वाले जीव मधुमक्खी की बात हो रही है। कहा जाता है कि हवा में उड़ता पैसा देखना हो तो मधुमक्खियोंको देखिए। इनके सात से अधिक उत्पादों की राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग है। महान वैज्ञानिक आइन्स्टाइन का कहना था की मधुमक्खियों के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन अधिक से अधिक चार वर्ष तक ही रह सकता है। ‘भारतीय माधवी परिषद’ के अनुसार मधुमक्खी पालन से किसानों की आय में गुणात्मक वृद्धि हो रही है। मधुमक्खी पालन ग्रामीण परिवेश में रोजगार का उत्तम साधन होने के साथ ही पूरे पारिस्थितिकीय तंत्र को सकारात्मक रूप से सुदृढ़ और सुंदर बनाता है। कृषि और मधुमक्खी पालन एक दूसरे के पूरक भी हैं।
मधुमक्खियों की दुनिया ही अलग है। पृथ्वी पर २०,००० से अधिक प्रकार की मधुमक्खियाँ हैं जिनमें से मुख्य रूप से चार प्रकार की मधुमक्खियाँ ही शहद बना पाती हैं। मधुमक्खी के हर छत्ते में एक रानी, कई हजार श्रमिक और कई नर होते हैं। मधुमक्खी अपनी विशेष प्रकार की ग्रन्थि से निकलने वाले मोम से अपना घर बनाती हैं जिसे शहद का छत्ता (Honey Comb) कहा जाता है। इन छत्तों का इस्तेमाल मधुमक्खियाँ अपना परिवार बढ़ाने एवं भोजन इकट्ठा करने के लिए करती हैं।
मधुमक्खियों के कुछ प्रमुख उत्पाद इस प्रकार है-
- शहद
- रॉयल जेली
- प्रोपोलिस
- बी पोलेन
- मोम
- बी वेनम
- मधुमक्खियाँ
मधुमक्खी पालन शुरू करने के लिए सर्वप्रथम स्थान का चयन किया जाना चाहिए। स्थान का चयन फूलों की उपलब्धता, सुरक्षा और सुविधा के अनुसार किया जाता है। सही स्थान के अतिरिक्त सफल मधुमक्खी पालन के लिए उचित प्रशिक्षण भी आवश्यक है।
मधुमक्खी पालन के फ़ायदों को देखते हुए कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती हैं। प्रामाणिक और प्रभावी प्रशिक्षण के लिए आप निमनांकित कुछ प्रमुख संस्थाओं में से किसी में भी संपर्क कर सकते हैं:
- भारतीय माधवी परिषद (नेशनल बी बोर्ड ) (https://nbb.gov.in/)
- कृषि विज्ञान केंद्र (https://icar.org.in/hi)
- जिला उद्यान विभाग
- खादी और ग्राम उद्योग आयोग (के वी आई सी) (https://www.kviconline.gov.in/)
किसान चाहें तो मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण अग्रिकाश के उदेस हनी फार्म्स से भी ले सकते हैं। इसके लिए आप फोन नंबर 9555211341 पर संपर्क कर सकते हैं अथवा info@agrikaash.com पर ईमेल कर जानकारी मँगा सकते हैं।
Wiki Of Goat Farming
चलता फिरती फ्रिज है ये! उपमाता भी कहलाती है!! गरीब का तो ए टी एम मानी जाती है !!!
चौंकिए मत हम गाँव-गली-मोहल्ले में बड़ी सादगी से घूमती फिरती मिल जाने वाली प्राणी बकरी की बात कर रहे हैं। दुनिया भर में इसने अपने हुनर के झंडे गाड़ रखे हैं। अर्थशास्त्री तो मानते हैं की बकरी गरीबों के विकास का बेहद कारगर जरिया हो सकती है। बेरोजगारी से मुकाबला हो या मुनाफा कमाने का इरादा, बकरी पालन हर तरीके से कारगर है।
काफी कम लागत में अच्छा फायदा बकरी पालन की खास बात है। बकरी पालन की विशेषता ये है कि अन्य मिलते जुलते व्यवसायों के मुकाबले ये ज्यादा सरल है। इसके लिए जटिल प्रक्रिया की जरूरत भी नहीं है। गाँव में तो छोटे स्तर पर इसे बिना किसी विशेष तैयारी के भी शुरू किया जा सकता है। और तो और गाय भैंस पालन की तुलना में बकरी पालन में आमदनी ज्यादा तेजी से बढ़ती है।
बकरी पालन से आजीविका तो चलायी ही जा सकती है साथ ही थोड़ी मेहनत कर अच्छा मुनाफा भी कमाया जा सकता है। व्यावसायिक बकरी पालन व्यावसायिक नियमों से किया जाता है जो सामान्य शौकिया बकरी पालन से थोड़ा भिन्न और अधिक व्यवस्थित होता है।
बकरी पालन दूध के लिए अथवा इसके मांस (Chevon) के लिए अथवा दोनों के लिए ही किया जा सकता है। बकरी की खाल चमड़ा उद्योग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ठंडे क्षेत्रों (जैसे लद्दाख, कश्मीर) में बकरियाँ ऊन के लिए भी पाली जाती हैं। पहाड़ों में इनका उपयोग बोझा ढोने के लिए भी किया जाता है।
बकरी पालन के कुछ फायदे इस प्रकार हैं:
- बकरी पालन रोजगार का एक अच्छा साधन है।
- बकरी एक छोटी और सीधी पशु है जो पालने में आसान है।ये मनुष्यों के साथ सुखपूर्वक रह लेती हैं।
- बकरी कम दाम में और आसानी से मिल जाती हैं।
बकरी का घर बनाना आसान है। - इसमें लागत कम लगती है और रख रखाव आसान होता है।
- अधिक जगह की जरूरत नहीं पड़ती।
- बकरियों की प्रजनन दर अच्छी होती है।
- बकरी पालन में जोखिम भी कम हैं।
- बाजार में नर और मादा बकरी लगभग एक ही दाम पर मिलते और बिकते हैं।
- अन्य पालतू पशुओं के मुकाबले बकरियों में कम बीमारियाँ होती हैं और ये आसानी से विभिन्न वातावरणों के अनुकूल ढल जाती हैं।
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी बकरी पालन आसानी से किया जा सकता है।
- इन्हे अन्य पशु पक्षियों के साथ भी पाला जा सकता है।
- बकरियाँ काँटेदार झाड़ियों सहित काफी तरह की घास आदि चर लेती हैं। कई बार इनका उपयोग जैविक तरीके से झाड़ियों के नियंत्रण के लिए किया जाता है।
- बकरी उत्पाद स्वास्थ्यवर्धक और सुपाच्य होते हैं।
बकरी का दूध मनुष्य के लिए विशेष उपयोगी और औषधीय गुणों से युक्त होता है इसलिए बकरी को केई बार ‘उपमाता’ भी कहा जाता है। - बकरी को दिन में कभी भी दुहा जा सकता है इसलिए इसे चलता फिरता फ्रिज भी कहते हैं।
- बकरी के संहार और मांस को लेकर सामाजिक प्रतिरोध नहीं हैं।
- बकरी का मांस अपने स्वाद और पोषण तत्वों के लिए प्रसिद्ध है।
- बकरी से चमड़ा और ऊन भी प्राप्त होता है।
- बकरी का मल अच्छी खाद के रूप में उपयोगी है ।
- अन्य पालतू पशुओं (गाय,भैंस) के मुकाबले इनसे आय दर बेहतर है।
बकरी पालन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई योजनायें भी चला रखी हैं ।
बकरी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जिसे हर श्रेणी का व्यक्ति कर सकता है। स्त्री, पुरुष, पढ़ा लिखा व्यक्ति या कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति – चाहे तो कोई भी व्यक्ति इस कार्य को सफलतापूर्वक कर सकता है। चूंकि बकरी पालन में लागत बहुत नहीं लगती इसलिए कम संसाधनों से भी इसे शुरू किया जा सकता है। जिनके पास कम पूंजी है वो भी इस व्यवसाय को आसानी से कर सकते हैं ।
जानकारियाँ-
1. ट्रेनिंग के मुख्य संस्थान-
क) मथुरा स्थित केंद्रीय बकरी अनुसन्धान संस्थान (CIRG, Mathura, http://www.cirg.res.in) में बकरी पालन का समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। इच्छुक किसान इस नंबर पर कर सकते हैं संपर्क :- फोन नं 0565-2763380
ख) भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र (https://icar.org.in) से भी बकरी पालन संबंधी जानकारी मिल सकती है।
ग) कृषि विज्ञान केंद्र: ये वो संस्थाएं हैं जो किसानों को प्रशिक्षण देने से लेकर विभिन्न कृषि उत्पादन प्रणालियों को खेतों में अपनाने तक के लिए कार्य करती हैं। कृषि विकास के लिए जिला स्तर तक काम करने वाली इन संस्थाओं के बारे में हर कृषि उद्यमी को जानकारी होनी चाहिए, ताकि वह इससे लाभ उठा सके।कृषि विज्ञान पोर्टल (http://kvk.icar.gov.in) से किसान अपने जिले में स्थित केवीके के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
2.बकरी पाने के मुख्य स्रोत –
यदि बकरियों की नस्ल के संबंध में विशेष योजना ना हो तो अपने आस पास के क्षेत्र की बकरियाँ प्राप्त करना बेहतर होगा। ये बकारियाँ आसानी से मिल जाएंगी और क्षेत्र के वातावरण के अनुकूल भी होंगीं । नस्ल विशेष की बकरियों को उनके मूल क्षेत्र से प्राप्त करना ज्यादा उचित रहता है- जैसे जमुनापरी बकरी इटावा क्षेत्र से और ब्लैक बंगाल बकरी पश्चिम बंगाल या झारखंड से। बकरी अपने या अन्य इलाकों के बकरी बाजार (मंडी) से भी प्राप्त की जा सकती है।
बकरी पालन की विधिवत जानकारी प्राप्त करें
बकरी पालन यूं तो बहुत सरल है किन्तु अच्छा होगा कि इसमें अपना समय, श्रम और धन निवेश करने से पहले मूलभूत प्रशिक्षण ले लें। अच्छा होगा कि अपने निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर बकरीपालन ट्रेनिंग संबंधी जानकारी ले लें। लगभग दस दिनों का ये आधारभूत प्रशिक्षण बकरी पालन में सफलता के लिए उपयोगी होगा। ऐसे प्रशिक्षण से प्राप्त सर्टिफिकेट बैंक लोन, सब्सिडी आदि पाने में भी लाभकारी होगा। केन्द्रीय बकरी अनुसंधान केंद्र, स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र, पशुचिकित्सा संस्थान, आदि वो स्थान हैं जहां से बकरी पालन संबंधी प्रामाणिक जानकारी और प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सकता है।
बकरी पालन के संबंध में प्रशिक्षण से लेकर बकरीपालन की व्यवस्था करने तक की प्रामाणिक जानकारी के लिए आप अग्रिकाश (Agrikaash) के कार्यालय से भी संपर्क कर सकते हैं। हमारा संपर्क फोन नंबर है. 9794380666 & 8448998942। आप हमें ramedarfarming@gmail.com या info@agrikaash.com पर ईमेल भी कर सकते हैं।
बकरी पालन के इच्छुक व्यक्ति को सबसे पहले बकरी पालन का प्रशिक्षण ले लेना चाहिए। प्रशिक्षण की व्यवस्था ना हो पाए तो किसी प्रशिक्षित या बकरी पालन में अनुभवी व्यक्ति से नियमित सलाह जरूर लें। इस उद्योग के लिए जिन मुख्य बातों पर ध्यान देना चाहिए वो हैं-
- बकरी पालन का स्थान चयन और बकरीघर की व्यवस्था।
- बकरी की प्रजाति का चयन।
- बकरी के आहार की व्यवस्था।
- बकरी के स्वास्थ्य रक्षा की व्यवस्था।
- विपणन और हिसाब किताब रखना।
बकरी मंडियाँ – ये हैं बकरियों की बड़ी मंडियाँ-
- देओनर (मुंबई),
- जसवंतनगर (उत्तर प्रदेश),
- कालपी (मध्य प्रदेश),
- महुआ (राजस्थान) और
- मेवात (हरियाणा)
इन बकरी मंडियों से देश में ही नहीं विदेशों में भी बकरियाँ जाती हैं।
(वाराणसी जिले में चौबेपुर के निकट नरायनपुर गाँव में अग्रिकाश द्वारा संचालित ‘रमेदार बकरी फार्म’ जाकर आप कम खर्च से विकसित बकरी उद्यम को देख-समझ सकते हैं। आप चाहें तो यहाँ से अपने बकरी उद्यम के लिए मार्गनिर्देशन भी ले सकते हैं। ‘रमेदार बकरी फार्म’ का संपर्क नंबर 9794380666 & 8448998942 है।)
Wiki Of Mushroom Farming
जी हाँ! बात हो रही है फूड ऑफ गॉड (Food of God) मशरूम की!
मशरूम की खेती के मुख्य पाँच चरण हैं-
- स्पॉन बनाना– स्पॉन (एक तरह से मशरूम का बीज) बनाना दरअसल एक विशेष प्रक्रिया है और यदि आप छोटे या मँझोले किसान है तो स्पॉन बाजार से लेना ही श्रेयस्कर होगा।
- कंपोस्ट बनाना– कंपोस्ट वह आधार है जिसमें स्पॉन को उगने-बढ़ने के लिए डाला जाता है। कंपोस्ट में उग-बढकर स्पॉन से मशरूम की फसल बनती है। कंपोस्ट बनाने के लिए पुआल, भूसी,यूरीआ और कुछ रसायनों की जरूरत होती है। इसे किसान अपने संसाधनों से बना सकते हैं। इसे बनाने में दो से चार सप्ताह लग जाते हैं।
- तैयार काम्पोस्ट की स्पॉनिंग– ये वो चरण है जब बनी हुई काम्पोस्ट में स्पॉन को डालकर काम्पोस्ट और स्पॉन का मिश्रण बनाया जाता है।ये मिश्रण पूरे काम्पोस्ट में एक समान रूप से या परतों में किया जा सकता है।
- आवरण अथवा परत चढ़ाना (casing)-इस प्रक्रिया द्वारा स्पॉन युक्त कम्पोस्ट को मशरूम उगाने के लिए स्थिर किया जाता है। या तो परत में बिछे हुए काम्पोस्ट-स्पॉन मिश्रण के ऊपर जीवाणुरहित खाद की परत बिछाई जाती है या कम्पोस्ट-स्पॉन मिश्रण को प्लास्टिक के छिद्रयुक्त थैलों में भरा जाता है।
- मशरूम की फसल लेना– इस चरण में तैयार मशरूम को केसिंग से तोड़कर उपयोग के लिए निकाला जाता है।कुल मिलकर मशरूम की खेती काफी सरल और लाभदायक होती है। किसान की दृष्टि से देखें तो इसकी कुछ खास बातें इस प्रकार हैं-
- ये खेती बंद कमरे में होती है इसलिए जमीन पर निर्भरता अत्यंत कम है ।
- इसमें कृषि कार्यों के अवशेष का ही सर्वाधिक उपयोग होता है ।
- इसकी फसल पोषण एवं औषधीय गुणों से भरपूर होती है ।
- ये खेती हर आयु वर्ग के लिए रोजगार का अच्छा जरिया है ।
- ये अतिरिक्त आय का भी अच्छा स्रोतहै ।
- यह खेती वातावरण के अनुकूल भीहै ।
मशरूम का उत्पादन अत्यंत सरल है और इसकी पौष्टिकता इतनी कि पूरी दुनिया ने इसका लोहा माना है। अपने बहुमूल्य गुणों की वजह से इसे सुपर फूड का दर्जा भी हासिल है । भारत में जहां एक ओर इसे सब्जियों की मलिका कहते हैं वहीं कुम्भ, छत्रक और धरती का फूल इसके अन्य नाम हैं।
वैज्ञानिक रूप से देखें तो मशरूम वनस्पति जगत का कवक है। मशरूम वनस्पति कुल का वह फफूँद है जो मांसल होने के साथ ही क्लोरोफिल रहित होता है। मशरूम की कई प्रजातियों में कुछ प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनका प्रयोग बहुतायत में भोजन के रूप में किया जाता है।
मशरूम की खेती क्यूँ!
सरल शब्दों में कहें तो जैसे बैगन एक फल है वैसे ही मशरूम भी एक फल ही है। जैसे बैगन में बीज होती हैं वैसे ही मशरूम में भी बीज होते हैं पर वो इतने छोटे होते हैं की उन्हें हम अन्य बीजों की तरह प्रयोग में नहीं ला सकते। जैसे बैगन का पौधा होता है वैसे ही मशरूम का पतले रेशे जैसा पौधा होता है जिसे माईसेलियम (mycelium) कहते हैं। खाद्य पदार्थों पर जो फफूंद हम प्रायः देखते हैं वो वास्तव में एक प्रकार का माईसेलियम ही होता है।
मशरूम की खेती के लिएमाईसेलियम की खेती की जाती है जिससे मशरूम की फसल निकलती है।इसके लिए माईसेलियम के वानस्पतिक प्रसार (Vegetative propagation) के गुण का उपयोग किया जाता है। उपयोगी माईसेलियम से मशरूम की खेती के लिए पहले माईसेलियम उगाया जाता है और इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है अन्यथा अवांछित श्रेणी के माईसेलियम भी उग आते हैं। वानस्पतिक प्रसार कर मशरूम उत्पादन के लिए तैयार माईसेलियम को स्पॉन कहते हैं। यदि आप बहुत विस्तार में मशरूम उत्पादन में नहीं हैं तो बाजार से स्पॉन खरीद लेना श्रेयस्कर रहता है।
मशरूम के प्रचलित प्रकार
वैज्ञानिकों के अनुसार मशरूम की हजारों किस्में हैं किन्तु खेती की दृष्टि से देखें तो मशरूम की कुछ ही किस्में महत्वपूर्ण और अच्छी मानी जाती हैं। कुछ लोकप्रिय मशरूम किस्में इस प्रकार हैं-
श्वेता/दुधचट्टा/मिल्की मशरूम
भारत का देशी, अत्यंत स्वादिष्ट और देखने में भी बहुत आकर्षक। अन्य मशरूम की तुलना में अधिक तापमान (25 से 35 डिग्री सेलसिअस) पर भी उगाया जा सकता है।
बटन मशरूम
मशरूम की ये सबसे लोकप्रिय प्रजाति है। पहले ये सिर्फ सर्दियों में मिलते थे पर अब संसाधनों के सहारे इन्हें साल भर उगाया जा सकता है।
ढींगरी/ऑयस्टर मशरूम
सबसे पहले प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी में इसकी खेती की गई। ऑयस्टर मशरूम सीपी या हथेली की आकृति का होता है और इसकी निचली सतह पर महीन परतें सी पाई जाती हैं जिनको गिल्स कहते है।
पैडी स्ट्रॉ/पुअरा (पुआल) मशरूम
बरसात के मौसम में यह धान के पुअरा में प्राकृतिक रूप से उगता है। शुरू में यह मटमैले रंग का होता है पर बढ़ कर छत्तेनुमा हो जाता है।
शिटाके मशरूम
विश्व में बटन मशरूम के बाद सबसे अधिक उगाए जाने वाला मशरूम। अपने स्वाद, पौष्टिकता और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध।
एनोकी/एनोकीटके/विन्टर मशरूम
विश्व में सबसे अधिक उगाए जाने वाले मशरूम में सेएक। जापानी व्यंजनों में लोकप्रिय। काफी ठंड के मौसम में भी उगाए जा सकते हैं।
श्वेता/दुधचट्टा/मिल्की मशरूम
भारत का देशी, अत्यंत स्वादिष्ट और देखने में भी बहुत आकर्षक। अन्य मशरूम की तुलना में अधिक तापमान (25 से 35 डिग्री सेलसिअस) पर भी उगाया जा सकता है।
बटन मशरूम
मशरूम की ये सबसे लोकप्रिय प्रजाति है। पहले ये सिर्फ सर्दियों में मिलते थे पर अब संसाधनों के सहारे इन्हें साल भर उगाया जा सकता है।
ढींगरी/ऑयस्टर मशरूम
सबसे पहले प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी में इसकी खेती की गई। ऑयस्टर मशरूम सीपी या हथेली की आकृति का होता है और इसकी निचली सतह पर महीन परतें सी पाई जाती हैं जिनको गिल्स कहते है।
पैडी स्ट्रॉ/पुअरा (पुआल) मशरूम
बरसात के मौसम में यह धान के पुअरा में प्राकृतिक रूप से उगता है। शुरू में यह मटमैले रंग का होता है पर बढ़ कर छत्तेनुमा हो जाता है।
शिटाके मशरूम
विश्व में बटन मशरूम के बाद सबसे अधिक उगाए जाने वाला मशरूम। अपने स्वाद, पौष्टिकता और औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध।
एनोकी/एनोकीटके/विन्टर मशरूम
विश्व में सबसे अधिक उगाए जाने वाले मशरूम में सेएक। जापानी व्यंजनों में लोकप्रिय। काफी ठंड के मौसम में भी उगाए जा सकते हैं।
मशरूम की खेती का प्रशिक्षण
यूं तो मशरूम की खेती के प्रशिक्षण के लिए अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं सक्रिय हैं, पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का खुम्ब अनुसंधान निदेशालय (Directorate of Mushroom Research जिसे पहले National Research Centre for Mushroom के नाम से जाना जाता था), इनमें अग्रणी है। ये निदेशालय हिमाचल प्रदेश में सोलन में स्थित है। विस्तृत विवरण के लिए देखें वेबसाईट http://www.nrcmushroom.org।
इसके अतिरिक्त भारत सरकार के लगभग सभी कृषि विज्ञान संस्थान मशरूम की खेती के प्रशिक्षण में सहयोग देते हैं। अपने निकट के कृषि विज्ञान केंद्र या उद्यान विभाग के कार्यालय से संपर्क कर इस संबंध में उचित सहायता ली जा सकती है.
आग्रिकाश के मशरूम उद्यम से भी इस संबंध में जानकारी ली जा सकती है। इसके लिए आप फोन नंबर 9936358982 पर संपर्क कर सकते हैं। जानकारी ईमेल info@agrikaash.com पर मेल कर भी मंगायी जा सकती है।
Wiki Of Pearl Farming
मौक्तिक,मोती या मुक्ता वो मनोहारी रत्न है जिसे रत्नों की रानी भी कहा जाता है। ये वो रत्न है जो सीपी के बेहद मुलायम ऊतकों से बनता है। कुछ विशेष प्रकार के मोतियों का उपयोग तो खाद्य पदार्थों, औषधियों और टॉनिकों में भी किया जाता है। समृद्धि, स्वास्थ्य, और सौन्दर्य के प्रतीक मोती को आधुनिक तकनीकों से सीपियों में विकसित किया जा सकता है। आज विश्व में लगभग सारा का सारा मोती उत्पादन इन्हीं तकनीकों से किया जाता है। मनुष्य द्वारा सीपियों में अपनी आवश्यकता अनुसार मोती विकसित करने की प्रक्रिया को ही मोती की खेती कहते हैं।
जीव वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो मोती वास्तव में सीपी की खोल की सामग्री का ही रूप है। प्राकृतिक रूप से ये तब बनता है जब सीपी के शरीर के अंदर मुलायम ऊतकों में कोई बाहरी कण फंस जाता है। सीपी की खेती में सीपी के शरीर में सुरक्षित सर्जरी द्वारा बाहरी कण आरोपित किया जाता है जो मोती बनने का केन्द्र बन जाता है। यही विकसित मोती इसकी खेती करने वाले किसान के लिए आय का स्रोत होता है। यदि आप के आस पास पानी से भरे प्राकृतिक या निर्मित गड्ढे हैं तो आप भी सीपियों में मोती उगाकर लाभ ले सकते हैं। सोने पे सुहागा ये कि सीपियों में मोती उगाने के साथ साथ मछली पालन भी किया जा सकता है इन गड्ढों में।
मशरूम की खेती के मुख्य पाँच चरण हैं-
लगभग 50 हजार रूपयों से 1000 सीपियों से शुरू कर के उचित परिस्थियों में साल भर में ढाई लाख तक की आमदनी पाई जा सकती है। इस तरह देखें तो काफी कम लागत से मोती पालन शुरू किया जा सकता है और थोड़े से धैर्य और श्रम से अच्छी कमाई की जा सकती है। आवश्यक है की ये उद्यम शुरू करने से पहले इसके लिए उचित प्रशिक्षण ले लिया जाए।
भारत में मोती की खेती के लिए सीपी पालन का प्रशिक्षण सीआईएफए यानि सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर (CIFA),भुवनेश्वर (ओडिशा) से प्राप्त किया जा सकता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए आप निम्नांकित पते पर संपर्क कर सकते है-
निदेशक
आई सी ए आर –सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर
कौसल्यगंगा, भुवनेश्वर – 751002, ओडिशा, भारत
फोन: 91-674-2465421,2465446 फैक्स: 91-674-2465407
ई -मेल: Director.Cifa@icar.gov.in(link sends e-mail), वेब साइट: www.cifa.nic.in
ये प्रशिक्षण लगभग एक सप्ताह का होता है और मोती की खेती का उद्यम शुरू करने के लिए उपयुक्त है। इसके अतिरिक्त कई निजी संस्थाएं भी इस उद्यम के लिए प्रशिक्षण देती हैं। किसी भी प्रतिष्ठित संस्था से प्रशिक्षण लेकर इस उद्यम को शुरू किया जा सकता है। इस संबंध में अग्रिकाश के विशेषज्ञों से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए फोन नंबर 9415698328 पर कॉल करें या info@agrikaash.com पर संपर्क करें।
मोती के लिए सीपी पालन की प्रक्रिया को संक्षिप्त रूप में इन चरणों में बाँट जा सकता है:
- लगभग 10 गुणे 10 फीट क्षेत्रफल और लगभग 6 फीट गहरे तालाब से भी मोती पालन का उद्यम शुरू किया जा सकता है।
- इनमें जिलाने के लिए सीपियाँ को एकत्रित करना होगा या सीपियाँ खरीदी भी जा सकती हैं।
- सीपियों के स्वास्थ्य और भोजन के लिए के कुछ उपकरणों और फ़ीड की आवश्यकता होगी।
- उपलब्ध सीपियों में एक छोटी सी शल्य क्रिया (सर्जरी) द्वारा 4 से 6 मि.मि. व्यास के कण/नाभिक (नूक्लीअस) आरोपित किए जाते हैं।
- ये नाभिक कई प्रकार के होते हैं और उनपर ही मोती की गुणवत्ता निर्भर करती है।
- समुचित देख रेख में नाभिक युक्त सीपियों को विशेष प्रकार की जालियों में डालकर तालाब में बढ़ने के लिए डालना होता है।
लगभग 8 से 10 महीनों तक तलाब में रहने के बाद स्वस्थ सीपियों में व्यापार योग्य मोती बन जाते हैं। - कई बार अधिक गुणवत्ता के लिए मोती को और भी अधिक महीनों तक सीप में बढ़ने दिया जाता है।
रोचक तथ्य है कि एक नाभिक युक्त सीपी पाने का खर्च लगभग 20 से 40 रुपये है जबकि इसमें विकसित होने वाले एक 20 मि.मि. आकार के मोती की कीमत 100 से 1500 रुपये तक हो सकती है। मोती लेने के बाद भी इन सीपियों को अन्य उपयोग में लाया जा सकता है। और तो और सीपियाँ पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करती हैं।
Wiki Of Dairy Farming
‘एग्रीकाश डेयरी सॉल्यूशंस’ वाराणसी के ग्रामीण क्षेत्रों में विकसित हो रहे डेयरी प्रचलनों पर आधारित एक उद्यम है जिसका लक्ष्य स्थानीय डेयरी उद्योग में विकासोन्मुखी परिवर्तन लाना है। पशुपालन और दूध उत्पादन के मुद्दों से निपटने से लेकर दूध इकट्ठा करने तक, एग्रीकाश बैनर के तहत यह उद्यम अपने कवरेज क्षेत्र में पशुपालकों के लिए वन-स्टॉप समाधान बनने के लिए तैयार है।
रामप्रवेश यादव, एक शिक्षित और उद्यमशील युवा किसान, अग्रिकाश डेयरी सॉल्यूशंस की अग्रणी शक्ति हैं। रामप्रवेश वर्षों से पारंपरिक तरीके से दुधारू पशुओं का पालन-पोषण कर रहे हैं, अब उन्होंने वैज्ञानिक और व्यावसायिक डेयरी उद्यमिता की एक नई यात्रा शुरू की है। टीम एग्रीकाश रामप्रवेश को अपने एक उद्यम प्रमुख के रूप में शामिल कर हर्षित है।
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